Sunday, 26 March 2017

तेरी कशिश


हर रोज दिए सी जलती हूँ।
  मोम बन कर पिघहलती हूँ।।
तेरे साए के आशिआने मे पलती हूँ।
ये तेरी तपिश है,, हर रोज सौ दफा मैं मरती हूँ।।
         ~पूजा मिश्रा

3 comments:

Unknown said...

Awesome :)

sukun.writeups said...

thank you Taslima khan

sukun.writeups said...

thank you Taslima khan

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