Saturday, 29 December 2018
मैं
मुझे तुमने पकड़ रखा है
बेड़ियों में जकड रखा है
मैं दिन रात तड़पती रहती हूँ
मैं सहमी सहमी खुद में उलझी कभी कुछ ना कहती हूँ
मेरे दर्द का ये करवा बहुत लम्बा है
तुम तक पहुँच पाऊ आसानी से
कहाँ मेरा सफर इतना आसा और छोटा है
मुझे तुमने खुद में पकड़ रखा है
तुमने मुझे बेड़ियों में जकड रखा है
मैं खुल के कभी साँसे नहीं लेती
मैं तुममे घुटती जलती हूँ
मैं दिन रात तुम्हारे साथ रह सकूँ
इस ख्याल में हर अगले पल मैं मरती हूँ
क्योंकि मुझे तुमने पकड़ रखा है
मुझे बेड़ियों में जकड रखा है
Friday, 28 December 2018
Thursday, 27 December 2018
Wednesday, 26 December 2018
Tuesday, 25 December 2018
उड़ान भरने को चले कदम
की अब एक नए सफ़र पर निकल चुकी हूँ
की अब थोड़ा और उड़ना बाकी है ,
मै नहीं जानती किसी रास्ते के अंजाम को
की अब निकल चुकी हूँ की थोड़ा और गिरना बाकी है |
भीड़ भरे रास्तो की ये खामोशियाँ शोर गुल का ये माहौल
कभी कभी कानो में चुभता बहुत है
जैसे ये सफर नहीं एक कारवां हो जो मुझे ठगता बहुत है |
की अब एक नए सफ़र पर निकल चुकी हूँ
की अब थोड़ा और उड़ना बाकी है |
लड़खड़ाते हुए क़दमों ने तो सौ दफ़ा कहा की अब मुड़ चलते है
पर वो तो ये बावरा सा मैं है जो कहता रहा तनिक भर की मंज़िल तक दूरी है आ अब उड़ चलते है |
की अब एक नए सफ़र पर निकल चुकी हूँ
की अब थोड़ा और उड़ना बाकी है |
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