Tuesday, 25 December 2018

उड़ान भरने को चले कदम

की अब एक नए सफ़र पर निकल चुकी हूँ 
की अब थोड़ा और उड़ना बाकी है ,
मै नहीं जानती किसी रास्ते के अंजाम को 
की अब निकल चुकी हूँ की थोड़ा और गिरना बाकी है |




भीड़ भरे रास्तो की ये खामोशियाँ शोर गुल का ये माहौल 
कभी कभी कानो में चुभता बहुत है 
जैसे ये सफर नहीं एक कारवां हो जो मुझे ठगता बहुत है | 
की अब एक नए सफ़र पर निकल चुकी हूँ 
की अब थोड़ा और उड़ना बाकी है |


लड़खड़ाते हुए क़दमों ने तो सौ दफ़ा कहा की अब मुड़ चलते है 

पर वो तो ये बावरा सा मैं है जो कहता रहा तनिक भर की मंज़िल तक दूरी है आ अब उड़ चलते है |


की अब एक नए सफ़र पर निकल चुकी हूँ 

की अब थोड़ा और उड़ना बाकी है |


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