Monday, 7 November 2016

खामोशी...

शम्मा भी एक पहर जल के बुझ गई।
कोई हमसे आकर पूँछे हम सारी रात जलते है।।

Thursday, 11 August 2016

अनचाहा

तुझसे नहीं जीती मैं खुद से हार गयी हूँ।।
अब तुझसे कहूँ भी तो क्या
एेसा लगता हैं सारी दुनिया को जान गयी हूँ।।
   ~पूजा मिश्रा

Friday, 17 June 2016

आखिरी पैगाम.....

तेरा आखिरी पैगाम आया था।


तेरा नाम लिखा था,मेरे नाम आया था।।


कुछ ही शब्दों मे तूने सारी बाते कह डाली थी।

दिन के उजाले से लेकर रातो की चाँदनी का जिक्र आया था। मेरी मेहँदी की खुशबू तेरी मोहब्बत की बाते हर निशानी का जिक्र आया था।।

मेरे नाम तेरा यही एक आखिरी पैगाम आया था। लाल रंग मे लिपटा हुआ तेरी चाहत की खुशबू लिए मेरा नाम लिखा आया था।।

Thursday, 14 April 2016

अकेली

साजो़ शृगारं से सफेद रंग का नाता नही है।
ना आज ना कल कोई आता नही है।
कहती है दुनिया रंगों से मेरा जीवन भाता नही है।
मेरा चेहरा अब किसी को लुभाता नही है।
साजो़ शृगारं से मेरा कोई नाता नहीं है।
सड़को पर सजी गहनो की दुकान से मेरा कोई सामान आता नही है।
मेरे घर मे कोई मेरे नाम से खिलखिलाता नहीं है।
कहती है दुनिया रंग बिरंगी चीजों से मेरा नाता नहीं है।
मेरे लिए सादा कोना और आँसू है।
मुस्कुराहट मेरे चेहरे पर भाता नहीं है।
साजों शृगारं से मेरा कोई नाता नहीं है।।

औरत

ढकू़ तो खुद को ढकू कहा तक,,
अब जाउ तो मैं जाउ कहाँ तक।।
हर शायर की शायरी मैं हूँ,
यूं खॉ-मखाँ लोगो के सवालों में हूँ।।

बिन वजह हर किसी के ख्यालो में हूँ,
मैं हर जगह हर किसी की बातो मे हू।।
सबकी नजरों में भी हूं, बेखौंफ सी सस्ते भी हूँ।।
ना घर मे हूँ। ना मंजर पे हूँ।।
अपनी ही धुन में सगं दर्पण के हूँ।

बेपाक सी सबकी चाहत में हूँ।।

कभी दिल मे तो कभी कदमो में हूँ।
अपनी ही अठकेलियो में एक अधूरे मंजर पे भी हूँ।।
बेपाक सी एक राज़ सी हर किसी के पास थी।
कभी गलतियों में साथ थी,, तो कभी कदमों के। पास थी।।
हर तरफ़ से हर किसी की सिर्फ मैं ही प्यास थी।।
अब ढकू तो खुद को ढकू कहा तक,,
अब खुद को छुपाउ तो छुपाउ कहाँ तक।।

Thursday, 17 March 2016

पुराना किस्सा

सब के सब मुझसे रूठे हैं,, ना जाने आज कौन सिरहाने आ बैठा।
आज बरसो बाद लगी जो सुकुन की आखँ अब कौन जगाने आ बैठा।
जिसको भुलाने की कोशिश मे सारी उम्र तमाम हुई आज वो दिल दहलाने वाली कहानी सुनाने कौन आ बैठा।
चदं पलो पहले ही तो सीखा था मुस्काना, हमने ना जाने वो पुराना किस्सा लिए कौन रूलाने आ बैठा।

उसने जब देखा सारी दुनिया मरहम रखने आयी है, ढुढं बहाना वो भी मुझ तक झूठे रस्मो को निभाने आ बैठा।
तनहाई के इस दौर मे एक रोंज ऐसा हुआ, यादो का आवारा पैमाना बन वो खुद ही बीती ऩज्म सुनाने आ बैठा।

Saturday, 5 March 2016

इतंहा

कभी साथ देने का वादा कर जाते हो,
तो कभी भूल जाने की इनायत दे जाते हो,
समझ ही नही पाती तुम मजबूर हो या मगरूर हो।

Tuesday, 1 March 2016

चाहत

मुझे भी औरो की तरह जीवन मे कई बार अाशा अौर निराशा मिली
कई पथरीले पथो पर मै एक सार चलती रही ताे कई बार रुक रुक रुक कर बिखरती रही।
मुझे भी औरो की तरह जीवन मे बहुत कुछ मिला, कभी खाली जेब अौर बंद मुठठी थी,
ताे कभी बदले मे मुस्कुराते चेहरे मिले।
कई दफा मै भी खिलखिलायी,
और एक सार चलती गई तो
कई दफे रास्ते बनते गए तो कभी हजारों बार मै मिटती गई।

Sunday, 28 February 2016

तस्वीर

आज एक शक्श एक तस्वीर लाया था 
लिफ़ाफ़े में लिपटी हुई मेरी तकदीर लाया था 
कह रहा था मे किसी  आँगन की सोभा बनूँगी 
उस तस्वीर से मेरी तकदीर जुड़ेगी 
मे चहु या न चाहू फर्क नही पड़ता
 उस तस्वीर के संग मेरी डोली सजेगी 
एक अजनबी शक्श की तस्वीर मेरी किस्मत बनेगी..

कुम्भ की विशेषतायें

वैसे तो समाज ने किन्नरों को कभी भी सामान अधिकार और समाज में उठने बैठने के लिए इज़ाज़त नहीं दी हैं ,   लेकिन प्रयागराज ...