Thursday, 14 April 2016

औरत

ढकू़ तो खुद को ढकू कहा तक,,
अब जाउ तो मैं जाउ कहाँ तक।।
हर शायर की शायरी मैं हूँ,
यूं खॉ-मखाँ लोगो के सवालों में हूँ।।

बिन वजह हर किसी के ख्यालो में हूँ,
मैं हर जगह हर किसी की बातो मे हू।।
सबकी नजरों में भी हूं, बेखौंफ सी सस्ते भी हूँ।।
ना घर मे हूँ। ना मंजर पे हूँ।।
अपनी ही धुन में सगं दर्पण के हूँ।

बेपाक सी सबकी चाहत में हूँ।।

कभी दिल मे तो कभी कदमो में हूँ।
अपनी ही अठकेलियो में एक अधूरे मंजर पे भी हूँ।।
बेपाक सी एक राज़ सी हर किसी के पास थी।
कभी गलतियों में साथ थी,, तो कभी कदमों के। पास थी।।
हर तरफ़ से हर किसी की सिर्फ मैं ही प्यास थी।।
अब ढकू तो खुद को ढकू कहा तक,,
अब खुद को छुपाउ तो छुपाउ कहाँ तक।।

No comments:

कुम्भ की विशेषतायें

वैसे तो समाज ने किन्नरों को कभी भी सामान अधिकार और समाज में उठने बैठने के लिए इज़ाज़त नहीं दी हैं ,   लेकिन प्रयागराज ...